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बैंक ने नहीं दिया लोन, बेचने पड़े मां के गहने, पर हारा नहीं बंगाली बाबू, बना दी 2000 करोड़ की कूरियर कंपनी

By Dabangdunia News Service | Publish Date: Jun 21 2024 5:00PM | Updated Date: Jun 21 2024 5:00PM
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एक मध्यम वर्गीय परिवार में पैदा हुए सुभाशीष चक्रबर्ती की जर्नी किसी प्रेरणादायी कहानी से कम नहीं है। वे जैसे-जैसे बड़े हुए, साइंस में उनकी रूचि बढ़ती गई। साइंस की पढ़ाई के लिए उन्होंने पार्ट-टाइम नौकरी भी की। पढ़ाई और जॉब का संतुलन बनाए रखा। कठोर तपस्या ने तब फल दिया, जब कैमिस्ट्री बैचलर्स में उन्होंने गोल्ड मेडल हासिल किया। उनके दृढ़ संकल्प की कहानी यही संदेश देती है कि पूरी मेहनत की जाए तो सफलता ज्यादा दूर नहीं होती। आज उनकी अपनी 2,000 करोड़ रुपये की कंपनी है। कंपनी का नाम देश के हर कोने में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी शान से चमकता है।

ये कहानी सुभाशीष चक्रबर्ती की है। वे डीटीडीसी (DTDC) के फाउंडर हैं और फिलहाल कंपनी में चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर हैं। आपके मन में प्रश्न उठ सकता है कि कैमिस्ट्री में गोल्ड मेडल पाने वाला शख्स आखिर कूरियर के धंधे में कैसे पहुंच गया? और चला भी गया तो कैसे हजारों करोड़ की वैल्यू वाली कंपनी खड़ी कर दी? हालांकि, वे खुद भी नहीं जानते थे कि इतनी बड़ी कंपनी बनाएंगे। शायद कभी सोचा भी नहीं था। एक इंटरव्यू में सुभाशीष चक्रबर्ती ने खुद कहा था- “उन दिनों में साफ था कि अच्छे नंबरों के साथ ग्रेजुएशन करने के बाद एक अदद नौकरी करनी है।” चलिए पूरी कहानी जानते हैं।

सुभाशीष चक्रबर्ती कोलकाता के एक मिडल क्लास परिवार में पैदा हुए। रामकृष्ण मिशन रेजिडेंशिल कॉलेज में कैमिस्ट्री की पढ़ाई की। पढ़ाई के दौरान ही वे एक बड़ी इंश्योरेंस कंपनी पीयरलेस के साथ काम करने लगे। पीयरलेस पूर्वी भारत में तो अच्छा काम कर रही थी, मगर दक्षिण भारत में उसे कोई नहीं जानता था। सो, कंपनी ने 1981 में सुभाशीष को बैंगलोर भेजा और वहां पीयरलेस का इंश्योरेंस बिजनेस स्थापित करने को कहा। वे गए और कुछ वर्षों तक इंश्योरेंस में काम करते रहे। मन में एक कसक थी कि अपना बिजनेस किया जाए। इंश्योरेंस सेक्टर की जानकारी थी, मगर रुचि नहीं थी। कैमिकल्स के बारे में अच्छे से जानते थे, और रुचि भी खूब थी।

ऐसे में 6 साल बाद 1987 में उन्होंने इंश्योरेंस कंपनी को अलविदा कहकर कैमिकल डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी शुरू की। कैमिकल का बिजनेस चल सकता था, मगर चला नहीं। न चलने के पीछे का असली कारण बनी पोस्टल सर्विस। उन्हें कूरियर कंपनी के साथ डील करने में बहुत समस्या हुई। सुभाशीष ने पाया कि पोस्टल सर्विस और ग्राहकों के बीच में एक बहुत बड़ा गैप है। यहीं से पूरा गेम बदल गया। सुभाशीष ने कैमिकल से नाता तोड़कर 26 जुलाई 1990 में DTDC नामक अपनी कूरियर कंपनी शुरू कर दी। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि DTDC का पूरा नाम डेस्क टू डेस्क कूरियर एंड कार्गो (Desk to Desk Courier & Cargo) है।

शुरुआत में बड़े शहरों पर फोकस करने के बाद जल्दी ही सुभाशीष चक्रबर्ती को समझ आ गया कि कूरियर सर्विस की ज्यादा डिमांड छोटे शहरों में है। मैसूर, मैंगलोर, और हुबली के साथ-साथ केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के छोटे शहरों में ज्यादा जरूरत भी है। 1990 में 20,000 रुपये लगाकर शुरू किए गए बिजनेस को कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। बैंक ने लोग देने से मना कर दिया था, क्योंकि वेंचर कैपिटल ही नहीं थी। सुभाशीष ने दिल पर पत्थर रखकर अपनी मां के गहने बेचकर बिजनेस को चलाना जारी रखा। परंतु वह भी कुछ ही महीनों चल सका। फिर से पैसे का संकट आन पड़ा।

1991 में सुभाशीष को एक ऐसा मंत्र सूझा, जिसने पूरी बाजी पलटकर रख दी। उन्होंने फ्रेंचाइजी मॉडल की शुरुआत की। क्षेत्रों को ज़ोन में बांटा गया। एक रीजनल ब्रांच 30 फ्रेंचाइजी संभालने लगी। कुछ ही समय बाद DTDC ने अपना सॉफ्टवेयर और कंप्यूटर सिस्टम भी फ्रेंचाइजीज़ पर उपबल्ध करवा दिया, ताकि ऑर्डर की रियल-टाइम ट्रैकिंग हो सके। यह एक ऐसी क्रांति थी, ग्राहक जिसकी जरूरत काफी समय से महसूस कर रहे थे। अब कूरियर भेजने वाला यह जान सकता था कि उसका पैकेट कहां तक पहुंचा है और कब वह सही हाथों तक पहुंच जाएगा। फ्रेंचाइजी आइडिया काम कर गया और गाड़ी अच्छे से चल पड़ी।

दक्षिण भारत से बिजनेस की शुरुआत करने वाली यह कंपनी फिलहाल 14,000 पिन कोड्स तक पहुंच रखती है। रिटेल ग्राहकों और बिजनेस दोनों के लिए डिलीवरी सेवाएं मुहैया कराने वाली कंपनी आपके घर से पिकअप कर सकती है और कहीं भी डिलीवरी दे सकती है। DTDC की वेबसाइट के मुताबिक, इसके नेटवर्क में 14,000 फिजिकल कस्टमर एक्सेस पॉइन्ट हैं। 96 फीसदी भारत के ही हैं। इसके अलावा इंटरनेशनल लेवल पर की उपस्थिति है। दुनिया के 220 डेस्टिनेशन ऐसे हैं, जहां पर DTDC की सेवाएं उपलब्ध हैं।

DTDC लगातार ग्रोथ कर रही है। कंपनी के पास बड़े-बड़े क्लाइंट हैं, जिनमें विप्रो, इंफोसिस और टाटा ग्रुप की कंपनियां भी शुमार हैं। 2006 तक कंपनी की 3700 फ्रेंचाइजी हो गई थीं और रेवेन्यू 125 करोड़ रुपये थे। इसी समय इसे रिलायंस कैपिटल से 70 करोड़ रुपये का निवेश मिला और यह 180 करोड़ रुपये की कंपनी बन गई। 2010 आते-आते फ्रेंचाइजी की संख्या 5000 हो चुकी थी। इस समय कंपनी की सेल 450 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। 2013 में डीटीडीसी ने निक्कोस लॉजिस्टिक्स में 70 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी। इसी साल कंपनी ने डॉटज़ोट (DotZot) की लॉन्चिंग की, जोकि ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए भारत का पहला डिलीवरी नेटवर्क बना। 2015 में हैदराबाद में ऑटोमेटिक लॉजिस्टिक हब बनाया गया।

2018 का आंकड़ा बताता है कि कंपनी हर साल 150 मिलियन से अधिक पैकेट शिप कर रही है और इसके फ्रेंचाइजी पार्टनर की संख्या 10,700 तक पहुंच गई। चूंकि और भी कंपनियां कूरियर डिलीवर करती हैं तो भी डीटीडीसी के पास लगभग 15 प्रतिशत का मार्केट शेयर है। फिलहाल, एक अनुमान है कि कंपनी का रेवेन्यू 2000 करोड़ के आसपास है। हालांकि इससे जुड़ा कोई आंकड़ा सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध नहीं है, मगर कुछ साल पहले एक बड़े मीडिया घराने ने इसके आईपीओ को लेकर एक खबर छापी थी। उस खबर में कहा गया था कि कंपनी 3,000 करोड़ रुपये का एक आईपीओ लाने वाली है। बता दें कि अभी तक कंपनी अपना आईपीओ नहीं लाई है।

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