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मुगलकालीन शिल्पकला का अद्धुत नमूना है कान्हा का ‘वृन्दावन’

By Dabangdunia News Service | Publish Date: Aug 11 2020 4:46PM | Updated Date: Aug 11 2020 4:47PM
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इटावा। भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं के साक्षी मथुरा स्थित वृंदावन से पूरी दुनिया भलीभांति परिचित है लेकिन उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में कान्हा की विश्रामस्थली के रूप में विख्यात ‘वृन्दावन’ मुगलकालीन शिल्पकला का अद्धुत नमूना मानी जाती है। 
 
मान्यता है कि मथुरा से अयोध्या जाते समय भगवान श्रीकृष्ण ने इटावा में जिस स्थान पर विश्राम किया था,उसे आज भी वृन्दावन के नाम से पुकारा जाता है। यहां मौजूद 24 से अधिक गगनचुम्बी मंदिरों में मुगलकालीन वास्तुकला की अनूठी झलक दिखायी देती है। जन्माष्टमी के मौके पर वृंदावन को आकर्षक तरीके से सजाया जाता है और यहां लगने वाले मेले में दूरदराज के क्षेत्रों से श्रद्धालु आया करते थे। हालांकि ये मंदिर आवासीय परिसरों से घिर गये है और अब यहां जन्माष्टमी की रौनक भी बीते जमाने की बात हो चुकी है।  
 
उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग की पुस्तक इतिहास के झरोखे में इटावा के अनुसार कुछ समय पहले तक इन मंदिरो मे मथुरा वृन्दावन की तर्ज पर जन्माष्टमी के दरम्यान भव्यतापूर्ण ढंग से सजाया जाता था और यहॉ आठ दिनो तक मेले की पंरपरा रहा करती थी लेकिन अब यह पंरपरा लोगो की अरूचि के कारण मंदिर सूने रहने लगे है ।
 
केके पीजी कालेज के इतिहास विभाग के प्रमुख डा.शैलेंद्र शर्मा ने यूनीवार्ता से कहा कि जिले का पुरबिया टोला एक समय आध्यात्मिक साधना का बडा केंद्र रहा है । असल मे पुरबिया टोला के वासी पुरातन पंरपराओ को निभाने मे सबसे आगे रहने वाले माने गये है इसी कड़ी मे यहां पर धार्मिक आयोजन खासी तादाद मे होते रहे है। 
 
मुगल बादशाह औरंगजेब के शासनकाल मे यहां पर टकसाले खोली गई थी। पुरबिया टोला गुप्तरूप से आध्यात्मिक साधना का केंद्र रहा है। बेशक एक वक्त धार्मिक केंद्र के रूप मे लोकप्रिय रहे पुरबिया टोला आधुनिक काल मे पुरानी परपंराओ से दूरी बनाता हुआ दिख रहा है जिसके प्रभाव मे अब पहले की तरह से यहां पर जन्माष्टमी नही मनाई जाती है।
 
उन्होने बताया कि इसी पावन भूमि पर इटावा का प्राचीन गुरुद्वारा भी है जिसे सिखों के प्रथम गुरु गुरुनानक के पुत्र श्री चंद की याद में उनके द्वारा स्थापित उदासीन सम्प्रदाय के भक्तों ने स्थापित किया था । इटावा के पुरबिया टोला मुहल्ले में स्थित 24 से अधिक मंदिरों में 11 बड़े मंदिर हैं। 
 
इन मंदिरों में जवाहरलाल, जगन्नाथ मंदिर, सिपाही राम मंदिर और जिया लाल मंदिर की बनावट पर मुगलकालीन शिल्प कला का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। अन्य मंदिरों की बनावट पारंपरिक है । इन मंदिरों में तीन ठाकुर द्वारे है। दो राधाकृष्ण के और एक राम, लक्ष्मण , सीता का मंदिर है। शेष शिव मंदिर हैं । इन सभी मंदिरों की बनावट काफी चित्ताकर्षक है और इनकी गगनचुंबी चोटियां देखकर दूर से ही इस बात का आभास हो जाता है कि यहां पर विशालकाय मंदिर हैं। 
 
मंदिरों की इन गगनचुम्बी चोटियों पर आकर्षक तरीके से तरह-तरह की नक्काशी की गई है। मंदिरों की दीवारों पर लगे पत्थरों को काट-काट कर उन पर देवी-देवताओं की तस्वीरें उकेरी गयी है। पुरबिया टोला में 11 बड़े मंदिरो में सबसे पुराना जियालाल का मंदिर है। यह मंदिर नालापार क्षेत्र में स्थित है। जियालाल मंदिर के कारण ही पुरबिया टोला नालापार की पहचान होती है।
 
इतिहासकार के मुताबिक इस मंदिर के पास स्थित कुएं का निर्माण सन 1875 में किया गया था। इससे अनुमान लगाया जाता है कि मंदिर का निर्माण भी इसी के आसपास हुआ होगा। सन 1895 में रामगुलाम मंदिर की स्थापना हुई थी। इसके अलावा बडा मंदिर जो अपने सर्वोच्‍च शिखर के लिए मशहूर है वह दो बार में निर्मित हुआ था। पहले चौधरी दुर्गा प्रसाद द्वारा बनवाया गया था। फिर 1907 में उनके निधन के बाद दिलासा राम की देखरेख में 1915 में बन कर तैयार हुआ था। तलैया मैदान में स्थित चौधरी दुर्गाप्रसाद के मंदिर की ऊंचाई समुद् तल से करीब 90 फीट है। पहले इस मंदिर में भगवान शंकर की सोने चांदी की मूर्तियां स्थापित थी लेकिन अब वे यहां नहीं हैं।
 

 

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